साँई कैसा तेरा ये विधान न सब दिन एक समान
हे साँई बाबा हे साँई बाबा
साँई कैसा तेरा ये विधान न सब दिन एक समान
इक दिन हरिश्च्न्द्र भरे ख़ज़ाना - 4
फिर माँगे कफ़न का दान
न सब दिन एक समान
इक दिन रामचन्द्र चढ़े विमाना - 4
फिर हुआ उनका बनवास
न सब दिन एक समान
इक दिन बालक भयो सयाना - 4
फिर जाकर जरे मसान
न सब दिन एक समान
कहत कबीरा पद निरवाना - 4
जो समझे चतुर सुजान
न सब दिन एक समान
साँई कैसा तेरा ये विधान
न सब दिन एक समान.